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Pandit ji

Jagadguru Ramanandacharya
Katha Visheshagya

Skills - Spiritual Leadership, Vedic and Sanskrit Scholarship, Education & Teaching, Public Speaking & Oratory, Writing & Research, Social Reform & Disability Advocacy

Language - Sanskrit, Hindi, Awadhi, English

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Jagadguru Ramanandacharya Swami Rambhadracharya is a revered Hindu spiritual leader, Sanskrit scholar, educator, poet, and social reformer. As one of the four incumbent Jagadguru Ramanandacharyas, he has held this prestigious title since 1988. He is the founder of Tulsi Peeth in Chitrakoot and the lifelong chancellor of the Jagadguru Rambhadracharya Handicapped University, dedicated exclusively to students with disabilities.

Early Life and Spiritual Journey Born as Pandit Giridhar Mishra on January 14, 1950, in Jaunpur, Uttar Pradesh, he lost his eyesight at the age of two months due to an eye infection. Despite being blind, he exhibited extraordinary intellectual abilities from a young age. By the age of five, he had memorized the entire Bhagavad Gita, and by seven, he had mastered the Ramcharitmanas of Tulsidas.

His Upanayana (sacred thread ceremony) was performed on June 24, 1968, during which he was initiated into the Rama mantra. His deep knowledge and devotion soon led him to become a renowned Katha artist, delivering discourses on the Ramayana and Bhagavata Purana across India and abroad.

Academic Achievements Despite facing challenges due to his blindness, Swami Rambhadracharya pursued higher education with remarkable determination. He studied Sanskrit grammar, philosophy, and literature, earning multiple degrees, including:

  • Shastri (Bachelor of Arts) from Sampurnanand Sanskrit University
  • Acharya (Master of Arts) in Vyakarana, where he secured seven gold medals
  • Vidyavaridhi (PhD) with a dissertation on non-Paninian usages in the Adhyatma Ramayana
  • Vachaspati (DLitt) for his extensive work on Panini’s Ashtadhyayi, awarded by the then President of India, K. R. Narayanan

Contributions to Hindu Literature and Philosophy Swami Rambhadracharya is a prolific writer, having authored over 240 books and 50 research papers in Sanskrit, Hindi, Awadhi, and other languages. His works include:

  • Commentaries on the Ramcharitmanas and Hanuman Chalisa
  • A critical edition of the Ramcharitmanas
  • Sanskrit commentaries on the Prasthanatrayi (Upanishads, Bhagavad Gita, and Brahma Sutras)
  • Spiritual and philosophical treatises on Nyaya, Vedanta, and Sanskrit grammar

His unparalleled expertise in Tulsidas' compositions has established him as one of the foremost authorities on the Ramcharitmanas in India.

Religious and Social Contributions Swami Rambhadracharya founded Tulsi Peeth, a spiritual and social service institution in Chitrakoot, named after Saint Tulsidas. Through this institution, he has promoted Hindu scriptures, Ramayana studies, and Sanskrit learning.

In 2001, he established the Jagadguru Rambhadracharya Handicapped University, the first and only university in India dedicated exclusively to students with visual, hearing, mobility, and speech impairments. His efforts in empowering disabled individuals have earned him immense respect and recognition.

Influence and Recognition Apart from his religious and literary contributions, he is also an influential leader associated with the Vishva Hindu Parishad (VHP). His discourses are widely broadcast on television channels like Shubh TV, Sanskar TV, and Sanatan TV. His wisdom and oratory skills have made him a revered figure among devotees worldwide.

Legacy and Vision Jagadguru Ramanandacharya Swami Rambhadracharya continues to inspire millions through his teachings, literary works, and humanitarian initiatives. His dedication to preserving Hindu traditions, promoting Sanskrit education, and serving the differently-abled has left an indelible mark on society. His life stands as a testament to the power of devotion, intellect, and selfless service.


जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य एक प्रतिष्ठित हिंदू आध्यात्मिक गुरु, संस्कृत विद्वान, शिक्षाविद, कवि और समाज सुधारक हैं। वे चार वर्तमान जगद्गुरु रामानंदाचार्यों में से एक हैं और 1988 से इस प्रतिष्ठित उपाधि को धारण कर रहे हैं। उन्होंने चित्रकूट में तुलसी पीठ की स्थापना की और जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय के आजीवन कुलपति हैं, जो विशेष रूप से दिव्यांग छात्रों के लिए समर्पित है।

प्रारंभिक जीवन और आध्यात्मिक यात्रा

स्वामी रामभद्राचार्य का जन्म पंडित गिरिधर मिश्रा के रूप में 14 जनवरी 1950 को जौनपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। मात्र दो माह की आयु में नेत्र संक्रमण के कारण उनकी दृष्टि चली गई। हालांकि, उन्होंने बाल्यकाल से ही अद्वितीय बौद्धिक क्षमता का परिचय दिया। पांच वर्ष की आयु में उन्होंने संपूर्ण भगवद गीता कंठस्थ कर ली थी, और सात वर्ष की आयु में उन्होंने तुलसीदास रचित रामचरितमानस का पूर्ण अध्ययन कर लिया था

उनका उपनयन संस्कार 24 जून 1968 को संपन्न हुआ, जहां उन्हें राम मंत्र की दीक्षा प्राप्त हुई। अपनी गहरी विद्वता और भक्ति के कारण वे शीघ्र ही एक प्रसिद्ध रामायण और भागवत पुराण कथाकार बन गए और भारत सहित विदेशों में भी प्रवचन देने लगे।

शैक्षणिक उपलब्धियाँ

दृष्टिहीनता के बावजूद, स्वामी रामभद्राचार्य ने अपनी शिक्षा को पूरी दृढ़ता से आगे बढ़ाया। उन्होंने संस्कृत व्याकरण, दर्शन और साहित्य का गहन अध्ययन किया और कई प्रतिष्ठित डिग्रियाँ प्राप्त कीं, जिनमें शामिल हैं:

  • शास्त्री (बी.ए.) – संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय से
  • आचार्य (एम.ए.) व्याकरण में, जिसमें उन्होंने सात स्वर्ण पदक प्राप्त किए
  • विद्यावारिधि (पीएच.डी.) – अध्यात्म रामायण में अ-पाणिनीय प्रयोगों पर शोध
  • वाचस्पति (डी.लिट.) – पाणिनीय अष्टाध्यायी पर गहन शोध, जिसे भारत के तत्कालीन राष्ट्रपति के. आर. नारायणन द्वारा सम्मानित किया गया

हिंदू साहित्य और दर्शन में योगदान

स्वामी रामभद्राचार्य 240 से अधिक ग्रंथों और 50 से अधिक शोध पत्रों की रचना कर चुके हैं। उनकी प्रमुख कृतियाँ हैं:

  • रामचरितमानस और हनुमान चालीसा पर भाष्य
  • रामचरितमानस का समालोचनात्मक संस्करण
  • प्रस्थानत्रयी (उपनिषद, भगवद गीता, और ब्रह्मसूत्र) पर संस्कृत टीकाएँ
  • न्याय, वेदांत और संस्कृत व्याकरण पर आध्यात्मिक और दार्शनिक ग्रंथ

तुलसीदास की रचनाओं में उनकी असाधारण विद्वता ने उन्हें रामचरितमानस के शीर्ष विद्वानों में स्थान दिलाया है

धार्मिक और सामाजिक योगदान

स्वामी रामभद्राचार्य ने चित्रकूट में तुलसी पीठ की स्थापना की, जो एक आध्यात्मिक और सामाजिक सेवा संस्थान है। इसके माध्यम से उन्होंने हिंदू धर्मग्रंथों, रामायण अध्ययन और संस्कृत शिक्षा को बढ़ावा दिया।

2001 में, उन्होंने जगद्गुरु रामभद्राचार्य दिव्यांग विश्वविद्यालय की स्थापना की, जो भारत का एकमात्र विश्वविद्यालय है जो विशेष रूप से दृष्टिहीन, श्रवण बाधित, शारीरिक रूप से अक्षम और वाणी बाधित छात्रों के लिए समर्पित है। उनके इस प्रयास ने उन्हें व्यापक सम्मान और पहचान दिलाई है।

प्रभाव और मान्यता

धार्मिक और साहित्यिक योगदान के अतिरिक्त, वे विश्व हिंदू परिषद (VHP) से भी जुड़े हुए हैं। उनके प्रवचन शुभ टीवी, संस्कार टीवी और सनातन टीवी जैसे चैनलों पर प्रसारित होते हैं। उनकी वाक्पटुता और ज्ञान ने उन्हें विश्वभर के भक्तों के लिए एक प्रतिष्ठित आध्यात्मिक मार्गदर्शक बना दिया है।

विरासत और दृष्टिकोण

जगद्गुरु रामानंदाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य अपनी शिक्षाओं, साहित्यिक कार्यों और मानवतावादी पहल के माध्यम से लाखों लोगों को प्रेरित कर रहे हैं। हिंदू परंपराओं के संरक्षण, संस्कृत शिक्षा के प्रचार और दिव्यांगों की सेवा के प्रति उनकी निष्ठा ने समाज पर एक अमिट छाप छोड़ी है।

उनका जीवन भक्ति, बुद्धिमत्ता और निःस्वार्थ सेवा की शक्ति का प्रत्यक्ष प्रमाण है।